कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा, कोकिला का रुप स्वर, तथा स्त्री का रुप पतिव्रत्य है ।, रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः । मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते Designed by Elegant Themes | Powered by WordPress, गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।, शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।, गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकार स्तेज उच्यते ।, विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् ।, विनय फलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुत ज्ञानम् ।, एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् ।, दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् ।, योगीन्द्रः श्रुतिपारगः समरसाम्भोधौ निमग्नः सदा शान्ति क्षान्ति नितान्त दान्ति निपुणो धर्मैक निष्ठारतः ।, दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः स्पर्शश्चेत्तत्र कलप्यः स नयति यदहो स्वहृतामश्मसारम् ।, पूर्णे तटाके तृषितः सदैव भूतेऽपि गेहे क्षुधितः स मूढः ।. विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ keep doing good work, Thank you very much isne mera Kam asan kar diya. पाठ १२. विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृतिशक्ति, तत्परता, और कार्यशीलता, ये छे जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहि ।, द्यूतं पुस्तकवाद्ये च नाटकेषु च सक्तिता । विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् । धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा । Thank you very much for such a great collection of slokas in Devanagari script, with meaning. Aug 30, 2016 - This website is for sale! अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥ शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या – ये दो प्राप्त करने योग्य विद्या हैं । इन में से पहली वृद्धावस्था में हास्यास्पद बनाती है, और दूसरी सदा आदर दिलाती है ।, सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । He is the cause of all the causes, the most superior, Parmatma, Para-Brahman and also known as Maryada-Purushottam. गाकर पढना, शीघ्रता से पढना, पढते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ जाना, अर्थ न जानकर पढना, और धीमा आवाज होना ये छे पाठक के दोष हैं ।, माधुर्यं अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः । चित्त (मन) की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है।, अर्थ- विद्वत्व, दक्षता, शील, संक्रांति, अनुशीलन, सचेतत्व और प्रसन्नता ये सात शिक्षक के गुण होते हैं।, अर्थ- जहाँ गुरु की निंदा होती है, वहाँ उसका विरोध करना चाहिए। यदि यह शक्य (संभव) न हो तो कान बंद करके बैठना चाहिए और यदि यह भी शक्य (संभव) न हो तो वहाँ से उठकर दूसरे स्थान पर चले जाना चाहिए।, अर्थ- विनय का फल सेवा है, गुरुसेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है और विरक्ति का फल आश्रव निरोध है।, अर्थ- अभिलाषा रखने वाले, सब भोग करने वाले, संग्रह करने वाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करने वाले और मिथ्या (झूठा) उपदेश देने वाले गुरु नहीं होते हैं।, अर्थ- गुरु शिष्य को जो एकाद (एक) अक्षर का भी ज्ञान देता है, तो उसके बदले में पृथ्वी का ऐसा कोई धन नहीं, जिसे देकर गुरु के ऋण में से मुक्त हो सकें।, अर्थ- जैसे दूध बगैर गाय, फूल बगैर लता, शील बगैर भार्या, कमल बगैर जल, शम बगैर विद्या और लोग बगैर नगर शोभा नहीं देते, वैसे ही गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देता।, अर्थ- योगियों में श्रेष्ठ, श्रुतियों को समझा हुआ, (संसार/सृष्टि) सागर में समरस हुआ, शांति-क्षमा-दमन ऐसे गुणोंवाला, धर्म में एकनिष्ठ, अपने संसर्ग से शिष्यों के चित्त को शुद्ध करनेवाले, ऐसे सद्गुरु बिना स्वार्थ अन्य को तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं ।, अर्थ- तीनों लोक जैसे स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल में ज्ञान देने वाले गुरु के लिए कोई उपमा नहीं दिखाई देती। गुरु को पारसमणि के जैसा मानते है, तो वह ठीक नहीं है। प्रिय वचन से दिया हुआ दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शौर्य, और दान की इच्छावाला धन – ये चार दुर्लभ है ।, अव्याकरणमधीतं भिन्नद्रोण्या तरंगिणी तरणम् । कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम् ॥ गुरु शिष्य ही परंपरा आपल्या देशांत फार प्राचीन काळापासून चालत आली असून आज देखील या परंपरेचे पालन केले जाते. Currently you have JavaScript disabled. सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥ जैसे नीचे प्रवाह में बहेनेवाली नदी, नाव में बैठे हुए इन्सान को न पहुँच पानेवाले समंदर तक पहुँचाती है, वैसे हि निम्न जाति में गयी हुई विद्या भी, उस इन्सान को राजा का समागम करा देती है; और राजा का समागम होने के बाद उसका भाग्य खील उठता है ।, विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् । Everything About Lord Shri Rama: Lord Shri Rama is the supreme personality of Godhead. ज्ञानमय, नित्य, शंकर रूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है॥3॥ श्लोक: करोडों शास्त्रों से भी क्या मिलेगा? Happy Birthday wishes in Sanskrit | संस्कृत में जन्मदिनम् Best happy birthday Status in sanskrit language for whatsapp and facebook share for everyone. Guru Slokas (गुरु श्लोक ) Guru is a Sanskrit term that connotes someone who is a "teacher, guide or master" of certain knowledge. अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥ Click here for instructions on how to enable JavaScript in your browser. कुल, छल, धन, रुप, यौवन, विद्या, अधिकार, और तपस्या – ये आठ मद हैं ।, सालस्यो गर्वितो निद्रः परहस्तेन लेखकः । गुरू श्लोक | Guru Shlok in Hindi - with a lot of Hindi news and Hindi contents like biography, bhagwad gita, shloka, politics, cricket, HTML, SEO, Computer, MS-Word, Vyakaran etc. भेषजमपथ्यसहितं त्रयमिदमकृतं वरं न कृतम् ॥ विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम् तेरा खज़ाना सचमुच अवर्णनीय है; खर्च करने से वह बढता है, और संभालने से कम होता है। अर्थातुर को सुख और निद्रा नहि होते; कामातुर को भय और लज्जा नहि होते । विद्यातुर को सुख व निद्रा, और भूख से पीडित को रुचि या समय का भान नहि रहेता ।, अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः । पितृ पक्ष का महत्व, Indian Army Motivational Quotes & Slogans, Anmol Vachan/ Suvichar/ Dhyey Vakya/ Quotes in Hindi, vidya mahima slokas in sanskrit with meaning, गुरु महिमा वंदना श्लोक | Sanskrit Slokas on Guru Teacher with Hindi Meaning, Sanskrit Subhashitani/Shlokas for Students with Hindi Meaning, परोपकार संस्कृत श्लोक | Sanskrit Slokas on Paropkar with Hindi Meaning, Sanskrit Quotes on Life with Hindi Meaning | जीवन पर संस्कृत सुभाषित श्लोक |, https://www.youtube.com/c/InfotainerWorld/. सद्गुरु तो अपने चरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को अपने जैसा बना देता है; इसलिए गुरुदेव के लिए कोई उपमा नहीं है, गुरु तो अलौकिक है।, अर्थ- जो इन्सान गुरु मिलने के बावजुद प्रमादी (लापरवाह) रहे, वह मूर्ख पानी से भरे हुए सरोवर के पास होते हुए भी प्यासा, घर में अनाज होते हुए भी भूखा और कल्पवृक्ष के पास रहते हुए भी दरिद्र है।, Your email address will not be published. Santshri Suman Bhaijiwas born on the 13th of April 1958 on the bank that purifies the guilty Bhagirathi mother Ganga. विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य का चित्त हरण नहि करता ? कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम् । कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ॥ विद्या माता की तरह रक्षण करती है, पिता की तरह हित करती है, पत्नी की तरह थकान दूर करके मन को रीझाती है, शोभा प्राप्त कराती है, और चारों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है । सचमुच, कल्पवृक्ष की तरह यह विद्या क्या क्या सिद्ध नहि करती ? गुरु वंदना, निश्शंक होई रे मना ओम श्री स्वामी समर्थ - श्लोक नागेन्द्र हाराये शिवतांडव - स्तोत्र शिव श्लोक हे जग त्राता दुर्जन, परायी स्त्री और परधन में ।. आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥ Click here for instructions on how to enable JavaScript in your browser. विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार में । अनादर कहाँ करना ? We hope you find what you are searching for! विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन ।, श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि । आभ्यन्तराः पठन सिद्धिकराः भवन्ति ॥ लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम् शुकोऽप्यशनमाप्नोति रामरामेति च ब्रुवन् ॥ व्ययतो वृद्धि मायाति क्षयमायाति सञ्चयात् ॥ न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥ कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना ॥ ज्ञानवानेव बलवान् तस्मात् ज्ञानमयो भव ॥ गुरु की सेवा करके, अत्याधिक धन देकर, या विद्या के बदले में हि विद्या पायी जा सकती है; विद्या पानेका कोई चौथा उपाय नहि ।, विद्याभ्यास स्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः । Required fields are marked *. by praveen gupta | May 28, 2018 | श्लोक | 0 comments, गुरू एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जो किसी व्यक्ति को शिक्षक, मार्गदर्शक या ज्ञान बाँटने वाले व्यक्ति के रूप में प्रख्यापित करता है। गुरू वह है जो ज्ञान देता है। अर्थात सांसारिक या पारमार्थिक ज्ञान देने वाले व्यक्ति को गुरू कहते हैं।, कुछ लोकप्रिय गुरू के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।, अर्थ- गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है और गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है। हम उन सद्गुरु को प्रणाम करते हैं।, अर्थ- गुरु के पास हमेशा उनसे छोटे आसन पर ही बैठना चाहिए। गुरु के आते हुए दिखाई देने पर भी अपनी मनमानी से नहीं बैठे रहना चाहिए। अर्थात गुरू का आदर करना चाहिए।, अर्थ- शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम (काबू) में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख (सामने) देखना चाहिए।, अर्थ- ‘गु’कार याने अंधकार, और ‘रु’कार याने तेज; जो अंधकार का निरोध (ज्ञान का प्रकाश देकर अंधकार को रोकना) करता है, वही वास्तव में गुरू कहलाता है।, अर्थ- प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, सच बताने वाले, रास्ता दिखाने वाले, शिक्षा देने वाले और बोध कराने वाले ये सभी गुरु के समान है ।, अर्थ- बहुत कहने से क्या होगा? शुद्ध बुद्धि सचमुच कामधेनु है, क्यों कि वह संपत्ति को दोहती है, विपत्ति को रुकाती है, यश दिलाती है, मलिनता धो देती है, और संस्काररुप पावित्र्य द्वारा अन्य को पावन करती है ।. आरोग्य, बुद्धि, विनय, उद्यम, और शास्त्र के प्रति राग (आत्यंतिक प्रेम) – ये पाँच पठन के लिए आवश्यक आंतरिक गुण हैं ।, आचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो । बाह्या इमे पठन पञ्चगुणा नराणाम् ॥ सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम् In order to post comments, please make sure JavaScript and Cookies are enabled, and reload the page. सत्संग ध्यान गुरु महाराज की शिष्यता-ग्रहण 14-01-1987 ई. boltechitra.com is your first and best source for all of the information you’re looking for. संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि वुद्धिः किल कामधेनुः ॥ अब वेबसाइट का यह YouTube चैनल आ गया है जहाँ आप को बहुत सुन्दर संस्कृत संग्रह और अन्य जानकारियां भी मिलेंगी। कृपया इस चैनल को सब्सक्राइब कर बेल आइकॉन दबाकर हर वीडियोज़ सबसे पहले पाएं —- https://www.youtube.com/c/InfotainerWorld/. Your email address will not be published. श्राद्ध के प्रकार? जिसे सुख की अभिलाषा हो (कष्ट उठाना न हो) उसे विद्या कहाँ से ?

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